मिर्जापुर। मड़िहान-हरिहरा ग्राम सीमा पर स्थित मीरजापुर-घोरावल राज्यमार्ग का वह ऐतिहासिक पुल, जिसने एक सदी से अधिक का सफर तय किया, आज अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें ले रहा है। सन 1902 में घाघर नहर पर बना यह पुल अब भारी वजन और प्रशासनिक उपेक्षा के बोझ तले कराह रहा है। पटेहरा नकटी, लुरकटीया और पटेवर डगडगवा की ओर से आने वाले अनियंत्रित भारी वाहनों के दबाव ने पुल के पूर्वी हिस्से को जर्जर कर दिया है, जो अब ढहने की कगार पर है। चेतावनी के बावजूद मौन है तंत्र
हाल ही में स्थानीय स्तर पर नीरज निर्भीक के द्वारा ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था। जनपद स्तरीय लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों तक इसकी सूचना पहुँच चुकी है, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। ताज्जुब की बात यह है कि अति-संवेदनशील स्थिति होने के बावजूद अब तक:
पुल के पास कोई यातायात नियंत्रण कर्मी तैनात नहीं किया गया है। भारी वाहनों के प्रवेश को रोकने के लिए कोई बैरियर या सांकेतिक बोर्ड नहीं लगाया गया है।
मरम्मत या नए विकल्प को लेकर कोई आधिकारिक पत्राचार सार्वजनिक नहीं हुआ है।यह महज एक पुल नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों के गुजरने का रास्ता है। पुल के पूर्वी दिशा में आ रही दरारें और गिरता हुआ मलबा इस बात का संकेत है कि यदि जल्द ही रूट डायवर्जन या भार क्षमता पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो यह किसी भी समय एक बड़े हादसे में तब्दील हो सकता है। "क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है? एक सदी पुराने पुल पर भारी ट्रकों का रेला न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आम जनता की जान से खिलवाड़ भी है।"
अगर मैं इसपर टिप्पणी करू तो विरासत और सुरक्षा के बीच की खाई एक जागरूक नागरिक और ब्लॉगर के रूप में मैंने जो मुद्दा उठाया है, मेरा कर्तव्य था लेकिन 1902 का यह पुल हमारी विरासत है, लेकिन वर्तमान में यह एक "डेथ ट्रैप" बनता जा रहा है। PWD और जिला प्रशासन की यह सुस्ती समझ से परे है। जब पुल का एक हिस्सा जवाब दे रहा है, तो भारी वाहनों का वहां से गुजरना सीधे तौर पर आपदा को आमंत्रित करना है। अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से यहाँ 'Weight Limit' बोर्ड लगाने चाहिए और सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति करनी चाहिए ताकि भारी वाहनों को पटेहरा नकटी और लुरकटीया के वैकल्पिक मार्गों पर मोड़ा जा सके।
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